जटायू का मोक्ष और श्रीराम की दिव्य स्तुति
रामचरितमानस का अरण्यकाण्ड केवल वनवास का वर्णन नहीं करता, यह करुणा, धर्म और भक्ति का महासागर है।
इसी काण्ड में तुलसीदास जी ने जटायू की हृदय–विदारक कथा और श्रीराम की करुणामूर्ति छवि को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से अंकित किया है।

जब रावण माता सीता का हरण कर ले गया, तब वृद्ध पक्षिराज जटायू ने अपने प्राणों की आहुति देकर उन्हें बचाने का प्रयास किया। रावण से युद्ध में घायल जटायू अंततः श्रीराम के चरणों में प्राण त्याग देते हैं।
तुलसीदास लिखते हैं –
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा ॥
स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी ॥
जटायू के देहत्याग के क्षण में स्वयं श्रीराम का दिव्य रूप प्रकट होना अद्वितीय प्रसंग है। वह रूप करुणामयी है, भक्तवत्सल है और मोक्ष प्रदान करने वाला है।
श्रीराम जटायू को केवल मोक्ष ही नहीं देते, बल्कि समस्त भक्तों को यह आश्वासन भी देते हैं कि – भक्ति और धर्म के लिए किया गया प्रत्येक बलिदान ईश्वर को स्वीकार्य है।
तुलसीकृत श्रीराम स्तुति
इसके बाद तुलसीदास जी जटायू के माध्यम से श्रीराम की भक्ति में यह विलक्षण स्तुति प्रस्तुत करते हैं –
छंद
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही ॥
पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।
नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं ॥ १ ॥
बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।
गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥ २ ॥
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं ॥
करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥
सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई ॥ ३ ॥
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा।
पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥
सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ ४ ॥
