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जब समुद्र ने न सुनी राम की विनय: भय बिना नहीं होती प्रीति

by Vaidik Marg · August 27, 2025

जब राम ने समुद्र से संवाद किया

कल्पना कीजिए…
लंका पहुँचने से पहले राम की सेना समुद्र तट पर आकर ठहर गई।
पुल बनाना था, पर समुद्र मार्ग नहीं दे रहा था।

मर्यादा–पुरुषोत्तम राम ने पहले विनम्रता से प्रार्थना की।
तीन दिन तक साधना की, तपस्या की, परंतु समुद्र जड़वत मौन रहा।

तब राम ने कठोर स्वर में कहा—
‘सठ से बिनय, कुटिल से प्रीति और लोभी को वैराग्य समझाना—
यह सब व्यर्थ है।
भय बिना प्रेम नहीं होता।’

यही वह क्षण था जब राम ने धनुष उठाया, और उनके बाण की ज्वाला से समुद्र–हृदय कांप उठा।
मगर जैसे ही जलचर जलने लगे, समुद्र ने ब्राह्मण रूप धारण कर शरण ली, और विनीत होकर राम से उपाय बताने लगा।

📜 मूल छंद (रामचरितमानस)

बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति ॥

चौपाई

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ॥

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती ॥

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी ॥

क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा ॥

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा ॥

संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ॥

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने ॥

कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना ॥

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