अरण्य की रणभूमि में तुलसीदास का शब्द–चित्र
सोचिए ज़रा… कैसी होगी वह घड़ी, जब दण्डकारण्य की शांत वनभूमि अचानक रणभूमि में बदल गई।
सीता–हरण से पहले ही राम और लक्ष्मण के तेज से पूरा वन कांप रहा था। तभी रावण का सेनापति खर-दूषण और उसके असंख्य राक्षसों की टोली युद्ध के लिए आ धमकी।

इधर केवल दो भाई — राम और लक्ष्मण।
उधर असंख्य दानव, जिनकी गर्जना से धरती हिल रही थी।
युद्ध का आरंभ हुआ, और देखते-देखते भगवान श्रीराम ने अपने बाणों से राक्षसों की सेनाओं को चीर डाला।
भाइयो, दृश्य इतना भयानक था कि जंगल की पगडंडियाँ खून से लाल हो गईं।
जहाँ-जहाँ रामजी का बाण लगता, वहाँ-वहाँ राक्षस छटपटाकर गिर पड़ते। शवों के ढेर लगते जा रहे थे, और हवा में गिद्ध, पिशाच और प्रेत मंडराने लगे।
मानो पूरा वन भूत-प्रेतों का उत्सव स्थल बन गया हो।
सियार कटकटा रहे थे, योगिनियाँ नाच रही थीं, बेताल कपाल बजा रहे थे।
ऐसा लग रहा था जैसे स्वयं मृत्यु ने अरण्य की धरती पर ताण्डव रचा हो।
और तुलसीदास जी… उन्होंने इस दृश्य को शब्दों में ऐसा बाँधा कि पाँच सौ साल बाद भी जब हम पढ़ते हैं तो आँखों के सामने पूरा चित्र खड़ा हो जाता है।
युद्ध की गर्जना सुनाई देती है, बाणों की टंकार गूँजती है, और हर शब्द से विभीषिका छलक पड़ती है।
तुलसीदास जी का छंद (अरण्यकाण्ड)
कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं ॥
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा ॥
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं ॥
संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं ॥
मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे ॥
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं ॥
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।
दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका ॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।
सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी ॥
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो।
देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो ॥
अद्भुत
यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि जब अन्याय और अधर्म अपनी पूरी शक्ति से सामने खड़ा हो, तब धर्म की विजय केवल संख्या से नहीं होती — वह होती है सत्य, विश्वास और ईश्वर की कृपा से।
अरण्यकाण्ड का यह युद्ध सिर्फ़ राक्षसों और राम का संघर्ष नहीं, बल्कि हर युग में अधर्म पर धर्म की जीत का शाश्वत प्रतीक है।
