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राम स्तुति – जय राम रमारमणम् शमनम्

by Vaidik Marg · August 24, 2025

राम स्तुति – जय राम रमारमणम् शमनम्

उत्तरकाण्ड
श्रीराम के राज्याभिषेक के पश्चात् स्तुति

जय राम रमारमणम् शमनम् । भव ताप भयाकुल पाहि जनम् ॥
अवधेश सुरेश रमेश विभो । शरणागत माँगत पाहि प्रभो ॥

दसशीश विनाशन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ॥
रजनीचर बृंद पतंग रहे । सर पावक तेज प्रचंड दहे॥

महि मंदल मंदन चारुतरम् । धृत सायक चाप निषंग बरम् ॥
मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥

मनजात किरात निपात किये । मृग लोग कुभोग सरेन हिये ॥
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । विषया बन पाँवर भूलि परे ॥

बहु रोग बियोगिन्हि लोग हये । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥
भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥

अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह कें पद पंकज प्रीत नहीं ॥
अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें । प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥

नहिं राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥
एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥

करि प्रेम निरंतर नेम लियें । पद पंकज सेवत शुद्ध हियें ॥
सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥

मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुवीर महा रनधीर अजे ॥
तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥

गुन सील कृपा परमायतनम् । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनम् ॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्व घनम् । महिपाल बिलोकय दीन जनम् ॥

दोहा:

बार बार बर मांगऊ हारिशी देहु श्रीरंग।
पदसरोज अनपायनी भागती सदा सतसंग॥
बरनी उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास॥

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