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समुद्र सेतु पर बढ़ती रामसेना : साहस और संकल्प का अद्वितीय दृश्य

by Vaidik Marg · August 24, 2025

समुद्र काँपा, पर्वत डोले—लंका विजय की ओर अग्रसर रामसेना

रामायण का यह प्रसंग केवल युद्ध–यात्रा नहीं, बल्कि धर्म और साहस की एक महान यात्रा का प्रतीक है। जब रामसेना समुद्र सेतु पर अग्रसर हुई, तो दिग्गज डगमगाए, पर्वत हिले और वानरों का कोलाहल गगनभेदी बना। इस दृश्य को तुलसीदास ने इतनी जीवंतता से चित्रित किया है कि लगता है मानो पूरी सृष्टि स्वयं प्रभु श्रीराम के प्रताप और धर्मयात्रा की साक्षी बन रही हो।

सुंदरकांड और लंकाकांड के संगम पर एक ऐसा दृश्य उपस्थित होता है, जहाँ प्रभु श्रीराम की सेना लंका विजय के लिए समुद्र-सेतु निर्माण कर आगे बढ़ती है। तुलसीदासजी ने इस प्रसंग को अत्यंत वीर-रस में बाँधा है—

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे ॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥

दृश्य

जब रामसेना समुद्र सेतु पर अग्रसर हुई तो मानो सम्पूर्ण सृष्टि हिल उठी। दिग्गज (हाथी) विचलित हो डगमगाने लगे, पर्वत थर्राने लगे, और समुद्र अपनी लहरों से उग्र रूप लेने लगा। परंतु इस भयावहता के बीच एक अद्भुत उल्लास था—सभी गंधर्व, देव, मुनि, नाग और किन्नर हर्षित थे।
वानरों का कोलाहल गर्जन बनकर गूँज रहा था और पूरी सेना “जय श्रीराम” की घोषणा करते हुए आगे बढ़ रही थी।

राम के प्रताप की झलक

दूसरी चौपाई में तुलसीदास समुद्र-देव के संघर्ष का उल्लेख करते हैं—

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ॥

सेतु पर पत्थरों और पर्वतों का भार इतना था कि स्वयं शेषनाग और कच्छप (कच्छपावतार) भी बार-बार विचलित हो उठते। किंतु श्रीराम का संकल्प अडिग था। उनकी दिव्य उपस्थिति इस दुष्कर कार्य को भी सफल बना रही थी।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

रामायण का यह प्रसंग केवल युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि यह धर्म पर विजय और असत्य पर सत्य की स्थापना का प्रतीक है। तुलसीदास के शब्दों में, राम का प्रयाण केवल लंका तक नहीं बल्कि प्रत्येक हृदय तक है। वह हमें यह संदेश देता है कि जब संकल्प दृढ़ हो और उद्देश्य धर्म-सम्मत हो, तो पर्वत, समुद्र और संपूर्ण प्रकृति भी सहयोगी बन जाती है।

संदेश

आज जब समाज अनेक चुनौतियों और कठिनाइयों से जूझ रहा है, तब यह प्रसंग हमें साहस और धैर्य की प्रेरणा देता है। विपरीत परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विकराल क्यों न हों—यदि उद्देश्य न्यायपूर्ण और लोककल्याणकारी है, तो विजय निश्चित है।
रामसेना का यह कोलाहल हमें याद दिलाता है कि जब समुदाय एकजुट होता है, तो असंभव भी संभव हो उठता है।


समुद्र-सेतु निर्माण का यह प्रसंग मात्र पौराणिक कथा नहीं है। यह वह प्रतीक है, जिसमें संकल्प, साहस, संगठन और सत्य की शक्ति का जीवंत दर्शन होता है। यही कारण है कि रामचरितमानस का यह वर्णन आज भी पाठकों को रोमांचित करता है और समाज को धर्म, नीति और एकता का मार्ग दिखाता है।

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