सिद्धांत और मर्यादा
वैदिक सिद्धांत और मर्यादा
हम वैदिक मार्ग के अनुयायियों का आधार यह विश्वास है कि धर्म और अनुष्ठान केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने और आत्मा को शुद्ध करने का माध्यम हैं।
अनुष्ठान तभी सफल और सार्थक होते हैं, जब वे शुद्धता, श्रद्धा और शास्त्रसम्मत विधि से किए जाएँ।
इसलिए हम प्रत्येक कर्म में कुछ निश्चित वैदिक सिद्धांतों और मर्यादाओं का पालन करते हैं।

हमारे प्रमुख सिद्धांत
१. शुद्धता (Pavitrata)
- किसी भी अनुष्ठान का मूल आधार शुद्धता है।
- शुद्धता तीन स्तरों पर आवश्यक मानी गई है—
- स्थान की शुद्धता: अनुष्ठान का स्थान स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए। भूमिपूजन, गंगाजल या पवित्र जल का छिड़काव करके स्थान को शुद्ध किया जाता है।
- व्यक्ति की शुद्धता: आचार्य एवं सहभागी स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र धारण करके और सात्त्विक भाव से उपस्थित होते हैं।
- सामग्री की शुद्धता: हवन सामग्री, पुष्प, फल, घी, जल आदि सभी शुद्ध, सात्त्विक और यथाशक्ति ताजे एवं पवित्र होने चाहिए।
- बिना शुद्धता के किया गया अनुष्ठान केवल एक कर्म रह जाता है, उसका आध्यात्मिक फल नहीं मिलता।
२. आडंबर से दूरी (Simplicity over Show-off)
- धर्म का सार भव्यता या दिखावे में नहीं, बल्कि श्रद्धा और निष्ठा में है।
- अक्सर समाज में यज्ञ-हवन या विवाह संस्कार को दिखावे का माध्यम बना दिया जाता है—
जहाँ आडंबर, अत्यधिक खर्च और सामाजिक प्रतिस्पर्धा प्रधान हो जाते हैं। - हमारी संस्था का विश्वास है कि भगवान और देवता को बाहरी शृंगार नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची भक्ति चाहिए।
- हम ऐसे अनुष्ठानों से दूर रहते हैं जहाँ मुख्य उद्देश्य प्रदर्शन या प्रतिष्ठा हो, न कि आत्मिक शांति।
- इसलिए हमारे अनुष्ठान सादगी, संयम और शांति के वातावरण में सम्पन्न होते हैं।
३. शास्त्रसम्मत विधि (Scriptural Authenticity)
- हमारे हर अनुष्ठान का आधार वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, गृह्यसूत्र, धर्मशास्त्र और आचार्य परंपरा है।
- कोई भी क्रिया, मंत्रोच्चार या विधि केवल तभी की जाती है जब उसका स्पष्ट उल्लेख शास्त्रों में मिलता है।
- आधुनिक विकृतियों, काल्पनिक प्रयोगों या केवल लोक-प्रचलन को हम अनुष्ठानों में स्थान नहीं देते।
- उदाहरण के लिए—
- विवाह में सप्तपदी और सप्तवचन अनिवार्य हैं, यह केवल एक सामाजिक रिवाज नहीं बल्कि शास्त्रीय विधान है।
- श्राद्ध में पिंडदान और तर्पण के बिना अनुष्ठान अधूरा माना जाता है।
- इस प्रकार, हर अनुष्ठान शुद्ध वैदिक परंपरा से ही सम्पन्न होता है।
४. निस्वार्थ भाव (Selflessness)
- धर्म का मूल आधार निस्वार्थ सेवा है।
- आचार्य और पंडित अनुष्ठान को व्यापार नहीं मानते।
- दान और दक्षिणा को केवल श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है, न कि शुल्क या लेन-देन।
- हम यह मानते हैं कि—
- जो अनुष्ठान केवल धन के लिए किया जाए, वह सेवा न होकर लेन-देन बन जाता है।
- जो अनुष्ठान श्रद्धा और निष्ठा से किया जाए, वह आत्मा और समाज दोनों को पवित्र करता है।
५. सात्त्विक आचरण (Righteous Conduct)
- अनुष्ठान के दौरान आचार्य और सहभागी सभी को सात्त्विक आचार-विचार अपनाने होते हैं।
- इसका अर्थ है—
- सात्त्विक आहार का पालन।
- संयमित वाणी, शुद्ध विचार और मर्यादित आचरण।
- अनुष्ठान से पहले और दौरान अनुशासन और नियमों का पालन।
- यदि आचार्य या सहभागी स्वयं सात्त्विक नहीं होंगे, तो अनुष्ठान की पवित्रता और उसका फल दोनों बाधित होंगे।
६. समर्पण और श्रद्धा (Dedication & Devotion)
- अनुष्ठान केवल मंत्रों की औपचारिक पढ़ाई नहीं है।
- मंत्रोच्चार तभी प्रभावी होते हैं, जब उन्हें मन, वाणी और कर्म से पूर्ण समर्पण के साथ किया जाए।
- श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी कर्म केवल शारीरिक क्रिया रह जाता है, उसका आध्यात्मिक फल नहीं मिलता।
- इसलिए हम मानते हैं—
- श्रद्धा ही अनुष्ठान की आत्मा है।
- समर्पण ही उसकी शक्ति है।
हमारी प्रतिबद्धता
हम यह मानते हैं कि—
🔹 धर्म का सार सरलता और पवित्रता में है, दिखावे में नहीं।
🔹 हर अनुष्ठान व्यक्ति और समाज को संस्कारित करने का माध्यम है।
🔹 वैदिक परंपरा केवल स्मृति नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है।
अतः
हम वैदिक मार्ग के अनुयायियों का हर अनुष्ठान इन्हीं वैदिक सिद्धांतों और मर्यादाओं पर आधारित है।
यही कारण है कि हमसे जुड़े आचार्यगण केवल शुद्ध वेदसम्मत, सात्त्विक और निस्वार्थ भाव से ही धर्मकर्म करते हैं।
🌿 “शुद्धता ही धर्म का प्राण है, और मर्यादा ही उसकी आत्मा।” 🌿
