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अरण्यकाण्ड की गाथा: धर्म की रक्षा और अधर्म का अंत

by Vaidik Marg · August 24, 2025

खर–दूषण के वध से कांपा वन: जब राम की विजय ने रावण को ललकारा


कल्पना कीजिए… पंचवटी की उस धरती की, जहाँ एक ओर साधारण से दिखने वाले तपस्वी राम विराजमान हैं, और दूसरी ओर राक्षसों का आतंक चारों दिशाओं में फैला है।
जब खर–दूषण और उनकी विशाल सेना राम पर टूट पड़ी, तब लगा जैसे वन का हर वृक्ष, हर जीव भय से काँप उठा हो।

लेकिन भाइयो–बहनो, वही राम, जिनके हाथों में केवल धनुष और बाण था, उन्होंने क्षणभर में उस भयावह सेना को चीर डाला।
राक्षसों की गर्जनाएँ मौन हो गईं, देवताओं ने पुष्पवृष्टि की, और आकाश में बाजे बजने लगे।

यही नहीं—राम की इस विजय ने केवल राक्षसों को समाप्त नहीं किया, बल्कि रावण के अहंकार को भी ललकार दिया।
यहीं से अयोध्या के राजकुमार और लंका के अधिपति का टकराव अपने निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ने लगा…

यहाँ तुलसीदास जी लिखते हैं …

📜 (अरण्यकाण्ड, तुलसीदास)

दोहा

राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ॥ २०(क) ॥

हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।
अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान ॥ २०(ख) ॥

चौपाई

जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥

सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता ॥
पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥

धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥
बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥

करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥

बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ॥
संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥

प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी॥

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