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जटायू का मोक्ष : करुणा और भक्तवत्सल राम का अनुपम प्रसंग

by Vaidik Marg · August 24, 2025

जटायू का मोक्ष : करुणा और भक्तवत्सल राम का अनुपम प्रसंग

भारतीय महाकाव्य रामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि धर्म, नीति और भक्ति का महासागर है।
अरण्यकाण्ड में वर्णित जटायू प्रसंग श्रीराम के करुणामय और भक्तवत्सल स्वरूप का अद्वितीय उदाहरण है।
एक साधारण गिद्ध, जिसने अपनी आयु ढल जाने पर भी माता सीता की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया, अन्ततः पराजित होकर धरती पर गिर पड़ा।
लेकिन उसका यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया—भगवान राम ने न केवल जटायू को अपने हाथों से अंतिम संस्कार का सम्मान दिया, बल्कि उसे मोक्ष प्रदान किया, जिसे पाने के लिए बड़े–बड़े योगी और मुनि साधना करते हैं।

दोहा

अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।

तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम ॥

चौपाई

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी ॥
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई ॥
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन ॥
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता ॥
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ॥
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ॥

तुलसीदास जी लिखते हैं कि जटायू ने भगवान राम से केवल अविरल भक्ति का वर माँगा।
राम ने उसकी देह का संस्कार स्वयं किया और उसे वही गति दी, जिसे पाने के लिए योगी जीवनभर तपस्या करते हैं।
यह प्रसंग बताता है कि ईश्वर का हृदय इतना विशाल और दयालु है कि वह किसी जीव की जाति, रूप या स्वभाव नहीं देखता—केवल उसकी भक्ति और समर्पण देखता है।

जटायू मोक्ष का यह प्रसंग हमें प्रेरित करता है कि—

  • सच्ची भक्ति और धर्म–रक्षा कभी निष्फल नहीं जाती।
  • भगवान भक्त का तुच्छ प्रयास भी महान बना देते हैं।
  • ईश्वर केवल योगियों या साधुओं के नहीं, बल्कि हर उस प्राणी के हैं, जिसके हृदय में निष्काम प्रेम और श्रद्धा हो।

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