सोने की लंका : वैभव की चकाचौंध में अधर्म का अंधकार
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥

तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लंका का ऐसा चित्र खींचा है, जो बाहर से सोने-रत्नों की चमक में जगमगाता है, पर भीतर से हिंसा, आतंक और अधर्म से भरा है।
लंका की नगरी सोने की दीवारों, रत्नजटित महलों और भव्य चौक-चौराहों से सजी थी। बाग-बगीचे, सरोवर और उद्यान उसकी शोभा को और निखारते थे। हाथियों–घोड़ों की टाप और रथों की गर्जना नगर के सामर्थ्य का परिचय देती थी। सुंदर रूपवती राक्षसियाँ और बलिष्ठ असुर, अखाड़ों में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते, मानो पूरी नगरी अद्भुत आकर्षण और ऐश्वर्य से भरी हो।
लेकिन यही लंका अपने वैभव के भीतर भयावह सच छिपाए थी। असुर मवेशियों और मनुष्यों को भक्षण करते, प्रजा आतंक और अधर्म से कराहती थी।
तुलसीदासजी लिखते हैं —
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ॥
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥ १ ॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥ २ ॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥ ३ ॥
सोने की लंका की यही दोहरी तस्वीर थी—
एक ओर अनुपम ऐश्वर्य, दूसरी ओर क्रूरता और पापाचार।
संदेश
तुलसीदासजी का स्पष्ट संदेश है —
बाहरी चमक-दमक यदि भीतर के धर्म और सत्य से खाली हो, तो उसका अंत निश्चित है।
श्रीराम का बाण ही उस अधर्म का अंत करता है और राक्षसों को “सही गति” प्रदान करता है।
लंका का वैभव धर्म की कसौटी पर टिक नहीं पाया। राम का सत्य और मर्यादा ही अंततः विजयी हुआ।
