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नल–नील के स्पर्श से तैरे पत्थर: समुद्र ने बताया सेतु–निर्माण का उपाय

by Swar Sanatan · August 27, 2025

समुद्र का रहस्य और नल–नील की शक्ति

राम की सेना समुद्र तट पर खड़ी थी।
तीन दिन की विनती और क्रोध के बाद समुद्र ने ब्राह्मण रूप में प्रकट होकर प्रभु से निवेदन किया।

समुद्रदेव ने बताया—
‘नाथ! नल और नील नामक दो वानर भाई हैं।
बाल्यकाल में इन्हें ऋषियों का वरदान मिला था कि इनके हाथ से जल में फेंका गया कोई भी पत्थर डूबेगा नहीं।

आप इनके बल और मेरे प्रताप से समुद्र पर पुल बना सकते हैं।
इस प्रकार आपका यश तीनों लोकों में गाया जाएगा।’

यही वह क्षण था जब समुद्र ने राम की महिमा स्वीकार की और सेतु–निर्माण का रहस्य प्रकट किया।

तब तुलसीदास जी लिखते हैं –

📜 मूल चौपाई (रामचरितमानस)

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई ॥

तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥

मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई ॥

एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥

सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा ॥

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी ॥

सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा ॥


समुद्र के इस रहस्योद्घाटन ने राम के हृदय में नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने वानरों के सामूहिक प्रयास और हनुमान की अगुवाई में समुद्र पर पुल बनाने का निश्चय किया। स्वयं ईश्वर होकर भी प्रभु ने श्रेय अपने सेवकों को दिया—यही उनकी करुणा और नेतृत्व का अद्भुत उदाहरण है।

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