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पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म के दौरान देव पूजा का विधान

by Vaidik Marg · September 9, 2025

पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म के दौरान देव पूजा की शास्त्रीय प्रामाणिकता

क्या है पितृ पक्ष में देव पूजा का सत्य?

आज हम एक ऐसी भ्रांति की बात करेंगे जो सदियों से हमारे समाज में प्रचलित है: क्या पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को घरों में गणेश, विष्णु, राम, काली जैसे देवी-देवताओं की पूजा बंद कर देनी चाहिए? गहन शास्त्रीय अनुसंधान के आधार पर, यह स्पष्ट है कि यह धारणा एक निराधार भ्रम है।

हमारे धर्मग्रंथों में शास्त्रों में, कर्मों को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है: नित्य कर्म (दैनिक अनिवार्य कर्म) और नैमित्तिक कर्म (विशेष अवसरों पर किए जाने वाले कर्म)। दैनिक देव पूजा नित्य कर्म है, जबकि श्राद्ध नैमित्तिक कर्म है। वैदिक और पौराणिक ग्रंथ स्पष्ट रूप से बताते हैं कि नित्य कर्मों का त्याग किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए, यहाँ तक कि पितृ पक्ष में भी नहीं। वास्तव में, पितृ कर्म की पूर्णता के लिए देव पूजा एक आवश्यक अंग मानी गई है। श्राद्ध कर्म स्वयं ही देवताओं और पितरों दोनों को एक साथ संबोधित करता है, जैसा कि ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च… जैसे मंत्रों से प्रमाणित होता है।

पितृ पक्ष में केवल नए मांगलिक कार्यों (जैसे विवाह, मुंडन, या नए अनुष्ठानों का शुभारंभ) का निषेध है, क्योंकि इन कार्यों का हर्ष और उल्लास का भाव श्राद्ध के करुणा और सादगी के भाव के विपरीत है। इसलिए, नित्य देव पूजा को जारी रखना न केवल उचित है, बल्कि यह पितरों की शांति और मुक्ति के लिए भी अनिवार्य है।


क्यों है यह विषय महत्वपूर्ण?

पितृ पक्ष, जिसे ‘पार्वण श्राद्ध‘, ‘कनागत‘ या ‘महालय पक्ष‘ के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और तर्पण का एक महत्वपूर्ण पखवाड़ा है। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति और उनकी मुक्ति के लिए श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। समाज में, इस अवधि को लेकर कई भ्रांतियाँ और नियम प्रचलित हैं, जिनमें से एक प्रमुख भ्रांति यह है कि पितृ पक्ष के 16 दिनों में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना नहीं करनी चाहिए। यह धारणा, विशेषकर शहरी और आधुनिक परिवेश में, लोगों के मन में संशय उत्पन्न करती है।

मेरा उद्देश्य प्रामाणिक धर्मग्रंथों, जैसे कि वेद, स्मृति, पुराण, और कर्मकांडीय ग्रंथों से साक्ष्य जुटाकर एक विद्वत्तापूर्ण और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करना है।

इसलिए हम निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं बात करेंगे:

  • दैनिक कर्मों और श्राद्ध के बीच अंतर।
  • किन कार्यों का निषेध है और क्यों, तथा किन कार्यों की अनुमति है।
  • मनुस्मृति, गरुड़ पुराण, स्कंद पुराण, और धर्मसिंधु जैसे ग्रंथों से सीधे शास्त्रीय प्रमाण पर चर्चा।
  • श्राद्ध कर्म का देव पूजा से संबंध और पंचबलि जैसे अन्य कर्मकांडों में देवताओं की भूमिका पर एक समग्र दृष्टिकोण।

कर्मों का विभाजन: नित्य और नैमित्तिक कर्म

किसी भी कर्मकांडीय नियम को समझने के लिए, कर्मों के मूल शास्त्रीय वर्गीकरण को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वर्गीकरण ही पितृ पक्ष में देव पूजा की अनुमति और निषेध के पीछे के तार्किक आधार को स्पष्ट करता है।

नित्य कर्म की अवधारणा

धर्मशास्त्रों में, नित्य कर्म वे दैनिक और अनिवार्य कर्म हैं जिन्हें नियमित रूप से करना आवश्यक है। मीमांसा और अन्य धर्मग्रंथों के अनुसार, इन कर्मों को करने से कोई विशेष फल प्राप्त नहीं होता है, बल्कि व्यक्ति उन पापों से मुक्त हो जाता है जो इन कर्तव्यों का पालन न करने पर उत्पन्न होते हैं। इस श्रेणी में प्रातः स्नान, संध्या वंदन, दैनिक देव पूजा, और पंचमहायज्ञ जैसे कर्म शामिल हैं। महाभारत के भीष्म पर्व में भीष्म द्वारा वर्णित कर्मों में नित्य कर्मों को जीवन निर्वाह के लिए अनिवार्य बताया गया है। एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि यदि इन कर्मों का त्याग करने से पाप लगता है, तो कोई भी विशेष परिस्थिति या अवधि इन कर्मों को बाधित नहीं कर सकती। यदि कोई व्यक्ति श्राद्ध जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान के दौरान अपने नित्य कर्मों का त्याग करके पाप का भागी बनता है, तो उसका श्राद्ध कर्म कैसे फलदायी हो सकता है? यह इस बात को स्पष्ट करता है कि नित्य देव पूजा को रोकना न केवल शास्त्र-विरुद्ध है, बल्कि यह श्राद्ध के उद्देश्य के भी विपरीत है, क्योंकि श्राद्ध स्वयं आत्म-शुद्धि पर आधारित एक अभ्यास है।

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नैमित्तिक कर्म की अवधारणा

इसके विपरीत, नैमित्तिक कर्म वे कर्म हैं जो किसी विशेष निमित्त (उद्देश्य या अवसर) पर किए जाते हैं। इन्हें न करने पर कोई पाप नहीं लगता है, लेकिन इन्हें करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है। श्राद्ध कर्म इसी श्रेणी में आता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार, श्राद्ध की परिभाषा है: जो कुछ उचित काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार उचित (शास्त्रानुमोदित) विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं। यह एक विशेष नैमित्तिक कर्म है जिसका उद्देश्य श्रद्धा के साथ पितरों को तृप्त और शांत करना है।

अंतर्निहित विरोधाभास और उसका समाधान

पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म (नैमित्तिक कर्म) की प्रधानता होती है, और इस दौरान नए शुभ कार्यों का निषेध होता है। इस निषेध को कई लोग दैनिक देव पूजा तक बढ़ा देते हैं, जो एक महत्वपूर्ण भ्रांति है। इसका शास्त्रीय समाधान भावगत सिद्धांतों में निहित है। श्राद्ध का भाव करुणा और शांति का है (करुण रस), जबकि विवाह जैसे मांगलिक कार्यों का भाव उल्लास और श्रृंगार का है (शृंगार रस)। ये दोनों भाव एक ही समय में एक साथ नहीं रह सकते, इसलिए नए मांगलिक कार्यों का निषेध किया गया है ताकि श्राद्ध का मूल भाव बना रहे। दैनिक देव पूजा न तो नैमित्तिक है और न ही मांगलिक, बल्कि यह एक नित्य कर्म है जिसका उद्देश्य आत्म-शुद्धि है और यह श्राद्ध के भाव के साथ पूर्ण सामंजस्य रखता है। इस प्रकार, इसका निषेध करना अनुचित और अप्रमाणिक है।


पितृ पक्ष में देव पूजा: शास्त्रीय विश्लेषण

प्रमाण जो पितृ पक्ष में देव पूजा की अनुमति और आवश्यकता को स्थापित करते हैं।

दैनिक देव पूजा की अनिवार्यता

विभिन्न आध्यात्मिक और पौराणिक स्रोतों के अनुसार, पितृ पक्ष में भी दैनिक देव पूजा जारी रखनी चाहिए। शास्त्रों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि देवताओं की पूजा के बिना पितरों के निमित्त किए गए श्राद्ध का पूर्ण फल नहीं मिलता। एक स्रोत के अनुसार, बिना विष्णु पूजन किये कोई श्राद्ध होता ही नहीं है। यह कथन इस आम धारणा को सीधे तौर पर चुनौती देता है।

इसके अतिरिक्त, पितरों की संतुष्टि के लिए देवताओं की पूजा आवश्यक है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में यह वर्णित है कि पितृ पक्ष के दौरान पीपल के वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने से पितरों को तृप्ति मिलती है। चूँकि पीपल में विष्णु, ब्रह्मा और महेश तीनों देवताओं का वास माना गया है, इसे जल अर्पित करना पितरों के लिए अत्यंत पुण्यकारी होता है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि पितृ और देव पूजा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह संबंध एक गहरे आध्यात्मिक पदानुक्रम को दर्शाता है, जहाँ पितरों को संतुष्ट करने का कार्य अंततः सर्वोच्च देवताओं की कृपा पर निर्भर करता है। श्राद्ध कर्म की शुरुआत में भी देवताओं का आह्वान और पूजन किया जाता है, जैसा कि ब्रह्म पुराण में वर्णित है कि

पार्वण श्राद्ध देवों से ही आरम्भ करना चाहिए

मांगलिक कार्यों और नए अनुष्ठानों का निषेध

धर्मशास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि पितृ पक्ष में नए मांगलिक कार्यों, जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, या नए कारोबार का आरंभ करना वर्जित है। यह निषेध इसलिए है क्योंकि इन कार्यों का उद्देश्य उल्लास और खुशी लाना है, जो श्राद्ध के करुणा और शांति के भाव के साथ मेल नहीं खाता। इसी प्रकार, किसी भी नए व्रत पूजा की शुरुआत या उद्यापन (समापन) भी नहीं करना चाहिए।

इस विशिष्ट निषेध के पीछे एक तार्किक सिद्धांत निहित है। नए अनुष्ठान और मांगलिक कार्य बहुत अधिक ऊर्जा और ध्यान की मांग करते हैं। पितृ पक्ष की अवधि में, यह ऊर्जा और ध्यान पूरी तरह से पितरों के प्रति निर्देशित होना चाहिए। नए कार्य शुरू करने से यह ध्यान भंग होता है। संभवतः, इसी कारण आम लोगों में मांगलिक कार्यों का निषेध को देव पूजा का निषेध के रूप में गलत समझा गया, क्योंकि दोनों ही पूजा के प्रकार हैं। हालांकि, एक नित्य कर्तव्य है और दूसरा एक विशेष अवसर का कर्म, और दोनों के पीछे का भाव और उद्देश्य पूर्णतः भिन्न है।


प्रामाणिक ग्रंथों से साक्ष्य, श्लोक और मंत्र

आएये विभिन्न धर्मग्रंथों से सीधे प्रमाण देखते हैं।

स्मृतियाँ: मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति

  • मनुस्मृति: मनुस्मृति में श्राद्ध के महत्व को स्थापित करते हुए कहा गया है कि देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते । इसका अर्थ है कि पितृ कार्य को देव कार्य से अधिक विशिष्ट माना जाता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि देव कार्य को त्याग दिया जाए। इसी ग्रंथ में आगे यह स्पष्ट किया गया है कि जो लोग अपने पितरों, देवताओं, ब्राह्मणों और अग्नि की पूजा करते हैं, वे सभी प्राणियों की अंतरात्मा में समाविष्ट मेरी (परमात्मा की) ही पूजा करते हैं। यह स्पष्ट करता है कि दोनों की पूजा एक ही आध्यात्मिक अभ्यास का हिस्सा है।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति: इस ग्रंथ की संरचनात्मक व्यवस्था भी इस प्रश्न का समाधान प्रदान करती है। याज्ञवल्क्य स्मृति में तीन मुख्य खंड हैं: आचार (धार्मिक आचरण), व्यवहार (नागरिक कानून), और प्रायश्चित्त (प्रायश्चित)। आचार खंड में, ‘श्राद्ध पर‘ अध्याय के बाद ही ‘गणपति की पूजा पर‘ और ‘ग्रहों को प्रसन्न करने पर‘ अध्याय आते हैं। यह अनुक्रम दर्शाता है कि एक ही अनुष्ठानिक ग्रंथ में पितरों और देवताओं, दोनों की पूजा का विधान है। यदि श्राद्ध के दौरान देव पूजा वर्जित होती, तो ये अध्याय एक ही धार्मिक प्रणाली में इतने निकट नहीं होते।

पुराण: गरुड़ पुराण और स्कंद पुराण

  • गरुड़ पुराण: पितृ तर्पण और श्राद्ध का एक केंद्रीय मंत्र गरुड़ पुराण में वर्णित है, जो देवताओं और पितरों के बीच के संबंध का सबसे शक्तिशाली प्रमाण है।
    • श्लोक:
    ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः।।

इस मंत्र में देवताभ्यः (देवताओं को) और पितृभ्यश्च (और पितरों को) दोनों का स्पष्ट रूप से उल्लेख है। यह मंत्र देवताओं और पितरों को एक साथ नमन करता है, जो इस बात को स्थापित करता है कि देव और पितृ पूजा एक दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही कर्मकांड का अभिन्न हिस्सा हैं।

  • स्कंद पुराण: स्कंद पुराण में एक श्लोक पितृ कर्म के साथ देव कर्म की अनिवार्यता पर प्रकाश डालता है।
    • श्लोक:
    सङ्गमेसरितां तत्र पितृन्संतप्यं देवताः। जपहोमादिकर्माणि कृत्वा फलमनन्तकम्।।

यह श्लोक कहता है कि नदियों के संगम पर पितरों का तर्पण करने के बाद देवताओं का तर्पण, जप और होम आदि कर्म करने से अनंत फल मिलता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पितृ कर्म के साथ देव कर्म किया जाना चाहिए और यह पूरक है।

कर्मकांड ग्रंथ और तर्पण विधि

निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु जैसे कर्मकांडीय ग्रंथों में वर्णित तर्पण विधि में न केवल पितरों के लिए, बल्कि देवताओं के लिए भी मंत्रों का प्रयोग होता है। तर्पण की शुरुआत ही देवों के तर्पण से होती है। इसके अतिरिक्त, श्राद्ध कर्म का एक अनिवार्य अंग पंचबलि है, जिसमें गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटियों के लिए भोजन निकाला जाता है। देवताओं के लिए देवादिभ्यो नमः मंत्र का उपयोग करके भोजन अर्पित किया जाता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि श्राद्ध के दौरान भी देवताओं को भोजन अर्पित किया जाता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि देव पूजा श्राद्ध का एक अभिन्न अंग है। पंचबलि कर्मकांड, जो एक सूक्ष्म लेकिन शक्तिशाली अभ्यास है, सार्वभौमिक कृतज्ञता और सूक्ष्म जगत के साथ संबंध को दर्शाता है। गाय में सभी देवताओं का वास माना जाता है, इसलिए गाय को बलि देना सीधे तौर पर देवताओं को प्रसन्न करता है। यह दर्शाता है कि श्राद्ध केवल पितरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार पूरे सूक्ष्म जगत तक है, जिसमें देव भी शामिल हैं।


श्राद्ध कर्म का समग्र दृष्टिकोण

पितृ पक्ष में ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन और घर में कलह-मुक्त वातावरण बनाए रखने का नियम है। ये नियम श्राद्ध के मूल भाव, यानी शांति और सादगी, को बनाए रखने के लिए हैं। दैनिक देव पूजा, जो स्वयं एक शांत और ध्यानपूर्ण क्रिया है, इन नियमों के साथ पूरी तरह से मेल खाती है।

श्राद्ध केवल पितरों के लिए ही नहीं, बल्कि श्राद्धकर्ता की आत्म-शुद्धि के लिए भी है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि आत्मज्ञान ही आत्म-शुद्धि का सबसे सरल उपाय है। देव पूजा आत्मज्ञान और आत्म-शुद्धि का एक अनिवार्य साधन है। इसे रोकने से न केवल श्राद्ध का एक महत्वपूर्ण पहलू बाधित होगा, बल्कि श्राद्धकर्ता के आध्यात्मिक विकास में भी बाधा आएगी। इस प्रकार, देव पूजा को रोकना श्राद्ध के समग्र उद्देश्य को बाधित करना है।


निष्कर्ष एवं सार संक्षेप

अतः शास्त्रीय विश्लेषण और प्रामाणिक धर्मग्रंथों से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर, यह स्पष्ट है कि पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने वाले व्यक्तियों को घरों में देवी-देवताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए, यह धारणा सर्वथा निराधार और भ्रामक है।

प्रमुख निष्कर्षों का सार निम्नलिखित है:

  1. दैनिक देव पूजा वर्जित नहीं है: दैनिक देव पूजा एक नित्य कर्म है, जिसे शास्त्रों के अनुसार किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसका त्याग करना स्वयं पाप का कारण बनता है।
  2. मांगलिक और नए अनुष्ठान वर्जित हैं: पितृ पक्ष में केवल नए मांगलिक कार्यों, जैसे कि विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि, का ही निषेध है। इसका कारण श्राद्ध के करुणा और सादगी के भाव के साथ इन कार्यों के हर्ष और उल्लास के भाव का विरोध है।
  3. देव पूजा श्राद्ध का एक अभिन्न अंग है: श्राद्ध कर्म स्वयं ही देवताओं और पितरों दोनों को एक साथ संबोधित करता है। ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च... जैसे मंत्र और पंचबलि में देवताओं को दी जाने वाली बलि इस संबंध का स्पष्ट प्रमाण हैं।
  4. शास्त्रों में स्पष्ट प्रमाण हैं: गरुड़ पुराण, स्कंद पुराण, मनुस्मृति, और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में श्राद्ध कर्म में देव पूजा की अनिवार्यता और दोनों के बीच पूरक संबंध का स्पष्ट उल्लेख है।

अतः, श्राद्धकर्ता को पितृ पक्ष के दौरान अपने नित्य कर्म, जिसमें दैनिक देव पूजा भी शामिल है, को पूरी निष्ठा से जारी रखना चाहिए। ऐसा करने से न केवल पितृ कार्य का पूर्ण फल प्राप्त होता है, बल्कि पितरों को भी सर्वोच्च देवों की कृपा से मोक्ष और शांति मिलती है।


तालिकाएँ और मंत्र

नित्य कर्म और नैमित्तिक कर्म के बीच अंतर

विशेषतानित्य कर्म (उदाहरण: दैनिक देव पूजा)नैमित्तिक कर्म (उदाहरण: श्राद्ध)
प्रयोजनपापों का क्षय और आत्म-शुद्धिकिसी विशेष निमित्त (जैसे पितरों की शांति) की पूर्ति
आवश्यकताअनिवार्य, न करने पर पाप का भागीअनिवार्य नहीं, लेकिन करने पर शुभ फल की प्राप्ति
समयनियमित दिनचर्या (दैनिक)विशेष अवसर (सालाना, पर्व-विशेष)
उदाहरणसंध्या वंदन, दैनिक पूजा, पंचमहायज्ञश्राद्ध, विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन
भावसादगी, समर्पण, कर्तव्य-परायणताकरुणा, शांति, सादगी
पितृ पक्ष में स्थितिनित्य जारी रखा जाना चाहिए, श्राद्ध की पूर्णता के लिए आवश्यक है इस अवधि का मुख्य कार्य, मांगलिक नैमित्तिक कार्यों का निषेध

श्राद्ध कर्म में देव पूजा की भूमिका: शास्त्रीय प्रमाण

ग्रंथसंदर्भश्लोक/मंत्रविश्लेषण
गरुड़ पुराणपितृ तर्पण मंत्र ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च...मंत्र देवताओं और पितरों को एक साथ नमन करता है, जो उनके पूरक संबंध को दर्शाता है।
स्कंद पुराणपीपल पूजा पीपल में विष्णु, ब्रह्मा और महेश तीनों देवताओं का वास माना गया है…पितृ पक्ष में पीपल की पूजा पितरों की तृप्ति के लिए की जाती है, जो देव पूजा का ही एक रूप है।
याज्ञवल्क्य स्मृतिअध्याय क्रम अध्याय X: श्राद्ध पर, अध्याय XI: गणपति पूजा पर…एक ही ग्रंथ में श्राद्ध और गणपति पूजा का निकट वर्णन यह दर्शाता है कि दोनों अनुष्ठानिक रूप से संगत हैं।
धर्मसिंधुपंचबलि विधि इदमन्नं देवादिभ्यो न मम...श्राद्ध के दौरान पंचबलि में देवताओं को भोजन अर्पित किया जाता है, जो देव पूजा की अनिवार्यता का प्रमाण है।
ब्रह्म पुराणश्राद्ध के नियम पार्श्वन श्राद्ध में देवों से ही आरम्भ करना चाहिए...यह स्पष्ट नियम है कि श्राद्ध के कर्मों की शुरुआत देवताओं के पूजन से होनी चाहिए।