नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ दुर्गा के नवरूपों का स्मरण, केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि जीवन के अंधकार में प्रकाश की ज्योति है।
आज के समय में जब समाज में अन्याय, आतंक और असत्य का प्रसार बढ़ रहा है, तब देवी माँ की शक्ति-आराधना हमें न केवल आध्यात्मिक शांति देती है, बल्कि धैर्य और साहस भी प्रदान करती है।
देवी माँ की स्तुति
करें मातु नित वन्दना, माँ दुर्गा नवरूप।
ब्रह्मचारिणी शैलजा, जनता हो या भूप।।
ज्ञान कर्म गुण हीन हम, क्या जाने हम रीति।
मातु भवानी कर कृपा, पाप हरो दो प्रीति।।
पुनः तारकासुर बहुत, घूम रहे इस देश।
अनाचार व्यभिचार जग, फैल रहे परिवेश।।
महिषासुर बन दहशती, दिया देश को डंक।
दुराचार हत्या कपट, फैलाते आतंक।।
माँ महिषासुरमर्दिनी, दुर्विचार अवसान।
पुनः स्वस्ति माँ भारती, प्रगति ख़ुशी मुस्कान।।
पतित पाविनी कालिके, चन्द्रघण्ट जगदम्ब।
कुष्माण्डे वन्दन करें, शिवा सृष्टि अवलम्ब।।
क्या जानें क्या हम साधना, क्या पूजन उपचार।
रोग शोक फँस लोभ हम, करो शिवा उद्धार।।
पुनः षडानन आगमन, मातु जगत कल्याण।
तारक द्रोही फिर वतन, स्कन्धमातु कर त्राण।।
विष्णुप्रिया कात्यायनी, पुनः करो हूंकार।
मरें धुम्रलोचन सभी, कामी खल ग़द्दार।।
चण्ड मुण्ड पापी असुर, जाति धर्म अवतार।
घृणा द्वेष का बन ज़हर, फैल रहा संसार।।
कालरात्रि तू कालिका, करो शत्रु निर्मूल।
चामुण्डा जग ख्याति फिर, बनो मातु अनुकूल।।
महाकाल विकराल मुख, करो जीभ फैलाव।
पीओ शोणित बीज का, वतन मुक्त अरि घाव।।
चीन पाक दानव युगल, शुंभ निशुंभ समाज।
महागौरि! संहार कर, सिद्धिदातृ माँ आज।।
हो पापी रावण दहन, जले प्रगति नव दीप।
शान्ति नेह सुख शारदे, दे जन देश महीप।।
सत्य न्याय परहित प्रजा, राष्ट्र विजय हो गान।
माँ दुर्गे नव शक्ति दे, बढ़े भक्ति यश मान।।
हो प्रसीद माँ वैष्णवी, कर निकुंज अभिराम।
समरस सद्भावन सुरभि, जीवन जग सुखधाम।।
स्वीकारो माँ वन्दना, चरणकमल दूँ शीश।
विजया ख़ुशियाँ बन खिले, पा माँ स्नेहाशीष।।
करूँ वन्दना शारदे, श्वेताम्बुज परिधान।
धवले वाणी सर्वदे, मति विवेक विज्ञान।।
इस स्तुति का भावार्थ
- देवी के नवरूपों का स्मरण – ब्रह्मचारिणी, शैलजा, महिषासुरमर्दिनी, कालिका, चामुंडा, कात्यायनी आदि सभी रूपों का आह्वान।
- समाज की व्याधियाँ – आतंक, अन्याय, व्यभिचार, दुराचार और छल का उल्लेख, जिन्हें माँ की शक्ति से नष्ट करने की कामना है।
- राष्ट्र कल्याण – इस रचना में माँ दुर्गा से केवल व्यक्तिगत सुख-शांति नहीं, बल्कि संपूर्ण देश और समाज की प्रगति, न्याय और सद्भावना की प्रार्थना है।
- भक्ति और समर्पण – अंत में माँ सरस्वती की वंदना कर ज्ञान, विवेक और विज्ञान का आशीर्वाद माँगा गया है।
यह वंदना माँ दुर्गा के प्रति गहन श्रद्धा और विश्वास की अभिव्यक्ति है। इसमें भक्त का हृदय केवल अपनी मुक्ति और कल्याण की कामना नहीं करता, बल्कि सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए माँ का आशीर्वाद माँगता है।
वास्तव में, यही नवरात्रि का सच्चा संदेश है – असत्य और अधर्म का अंत, और सत्य, न्याय तथा धर्म की स्थापना।
🙏 जय माता दी। 🙏
