नवरात्रि पूजन – वैदिक परंपरा अनुसार
नवरात्रि केवल त्योहार नहीं है, यह वैदिक परंपरा से जुड़ा एक पवित्र साधना पर्व है। वैदिक दृष्टि से यह समय आत्मचिंतन, शुद्धता, संयम और देवी शक्ति की आराधना का अवसर प्रदान करता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य जीवन को धर्म, ज्ञान और तपस्या से जोड़ने के लिए ऐसे पर्वों का विधान किया ताकि हर व्यक्ति अपने भीतर की ऊर्जा को जागृत कर सके। नवरात्रि का पूजन उसी वैदिक परंपरा का जीवंत स्वरूप है, जिसमें पूजा का हर चरण शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न होता है और उद्देश्य केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशुद्धि व आध्यात्मिक प्रगति होता है।

वैदिक परंपरा में नवरात्रि की शुरुआत घटस्थापना से होती है। प्रातः स्नान कर घर के पूजा स्थल को स्वच्छ कर कलश स्थापित किया जाता है। कलश में जल भरकर उसमें आम या अशोक के पत्ते रखे जाते हैं और ऊपर नारियल स्थापित कर धागे से बांध दिया जाता है। यह कलश देवी की उपस्थिति का प्रतीक है, जो पूरे नौ दिनों तक घर में देवी शक्ति के रूप में विराजमान रहती हैं। कलश स्थापना के समय मंत्रों का उच्चारण किया जाता है – जैसे “ॐ अपवित्रः पवित्रो वा…” से स्वयं को शुद्ध कर पूजा आरंभ की जाती है। इसके बाद देवी की ध्यान पूजा की जाती है, जिसमें देवी दुर्गा के स्वरूप का ध्यान कर उनकी कृपा प्राप्त करने का संकल्प लिया जाता है।
पूजन में प्रयुक्त सामग्री भी वैदिक परंपरा के अनुसार होती है। पूजा में रोली, अक्षत, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, पंचामृत आदि का प्रयोग किया जाता है। सप्तधान्य का विधान विशेष रूप से शास्त्रों में बताया गया है, जिसमें जौ, चना, गेहूँ, तिल आदि का प्रयोग कर बीज रोपे जाते हैं। इन बीजों का अंकुरित होना जीवन में समृद्धि और नयी ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। प्रत्येक दिन देवी के अलग स्वरूप की पूजा की जाती है। पहले दिन शैलपुत्री का ध्यान कर स्थिरता और धैर्य की प्रार्थना की जाती है, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी से तपस्या की प्रेरणा ली जाती है, तीसरे दिन चंद्रघंटा से आंतरिक भय से मुक्ति, चौथे दिन कूष्मांडा से ऊर्जा का आह्वान, पाँचवे दिन स्कंदमाता से मातृत्व का आशीर्वाद, छठे दिन कात्यायनी से शक्ति की प्राप्ति, सातवें दिन कालरात्रि से नकारात्मकता का नाश, आठवें दिन महागौरी से शुद्धता और नौवें दिन सिद्धिदात्री से जीवन में सिद्धियों की प्राप्ति की कामना की जाती है।
वैदिक परंपरा में पूजा करते समय मंत्रों का उच्चारण महत्वपूर्ण माना गया है। दुर्गा सप्तशती के श्लोक, “या देवी सर्वभूतेषु…” जैसे मंत्रों का जाप करके देवी की कृपा प्राप्त की जाती है। पूजा के समय अग्नि में आहुति देकर देवी को नैवेद्य अर्पित किया जाता है। वैदिक मत के अनुसार अग्नि में दी गई आहुति ब्रह्मांड में ऊर्जा का संचार करती है और वातावरण को शुद्ध करती है। ध्यान, प्रार्थना और जप के माध्यम से मन की चंचलता शांत होती है और साधक भीतर से मजबूत बनता है।
व्रत पालन भी वैदिक रीति से जुड़ा होता है। शास्त्रों में व्रत का अर्थ केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण, सात्विक आहार और सतत ध्यान बताया गया है। व्रत के दौरान प्याज, लहसुन, मांसाहार, मदिरा आदि से पूर्ण परहेज किया जाता है और फल, दूध, दही, मेवे, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा जैसे सात्विक पदार्थों का सेवन किया जाता है। व्रत का पालन व्यक्ति की इच्छाशक्ति को मजबूत करता है और मानसिक शुद्धि में सहायक होता है।
पूजा के साथ सेवा का भाव वैदिक परंपरा में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। देवी की पूजा करते समय केवल अनुष्ठान करना पर्याप्त नहीं, बल्कि आसपास के लोगों की मदद करना, अन्न दान करना, पशु-पक्षियों को भोजन देना और करुणा का भाव रखना भी पूजा का हिस्सा माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि सेवा और समर्पण से ही पूजा पूर्ण होती है।
वैदिक दृष्टि से नवरात्रि का पर्व स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। उपवास के दौरान शरीर का पाचन तंत्र हल्का रहता है, जिससे शरीर की सफाई होती है और मानसिक तनाव कम होता है। नियमित जप, ध्यान और श्वास नियंत्रण से मन स्थिर होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। वैदिक परंपरा में पूजा को शरीर, मन और आत्मा की एक साथ साधना माना गया है।
नवरात्रि के अंतिम दिन दशमी मनाई जाती है, जिसे विजयादशमी कहा जाता है। इस दिन पूजा कर देवी से विजय, समृद्धि और आत्मबल की प्रार्थना की जाती है। वैदिक परंपरा के अनुसार यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। पूजा के समापन पर पूरे परिवार के साथ आरती कर देवी का धन्यवाद किया जाता है और जीवन में धर्म का मार्ग अपनाने का संकल्प लिया जाता है।
इस प्रकार वैदिक परंपरा के अनुसार नवरात्रि पूजन व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसंयम, ध्यान, सेवा और समर्पण का मार्ग है। यह पर्व हमें भीतर की शक्ति से जोड़ता है, मन को संतुलित करता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा देता है। जब हम श्रद्धा और वैदिक विधि से पूजा करते हैं, तो यह केवल देवी की उपासना नहीं रहती, बल्कि आत्मा और ब्रह्मांड से जुड़ने का सच्चा मार्ग बन जाती है।
आइए, इस नवरात्रि वैदिक परंपरा का पालन करते हुए संयम, सेवा और साधना से अपने जीवन में नई ऊर्जा का संचार करें और देवी माँ की कृपा से आध्यात्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ें।
